Bebasi

Bebasi

उस पार है तू इस पार हूँ मैं अब कैसे तुझे बुलाऊँ मैं,
सौतन बैरी बिकराल नदी है बीच में कैसे आऊं मैं,
तन भीगा दिल में आग लगी,
मिलने की मन में प्यास जगी,
दिल करता उड़कर आ जाऊं,
पर पंख कहाँ से मैं पाऊं,
बरसों की तड़प है बीच में नद,
दुरी अब कैसे मिटाऊं मैं,
ऐ प्रियतम मेरे प्राण-नाथ, अब कैसे तुझे बुलाऊँ मैं,
सौतन बैरी बिकराल नदी है बीच में कैसे आऊं मैं ।।
मैं अमरलता तू कल्पबृक्ष,
मैं मीन तू जैसे पानीै है,
तू सेज है कोमल काँटों का,
खुशबु फूलों की रानी मैं,
तेरा मेरा क्या मेल प्रिये,
कैसे और किसे बताऊँ मैं,
बहती धारा के आर-पार हम,कैसे तुझे बुलाऊँ मैं,
सौतन बैरी बिकराल नदी है बीच में कैसे आऊं मैं ।।
हममे तुम हो तुम में मैं हूँ,
इस धार में खुशबु तेरी है,
आकर टकराती सीने से,
उस वार में खुशबु तेरी है,
है सौतन पर नद प्यारी है,
आओ इसके ही साथ चलें,
अल्हड को नशा समंदर का
आजा मिलवाने साथ चलें,
इस पगली के हम आर पार,
आजा मिल राह दिखाऊं मैं,
ऐ प्रियतम मेरे प्राणनाथ चल साथ में तुझे मनाऊं मैं।
संगम इसके हो जाते ही खुद मिल पहचान मिटाऊं मैं ।
ऐ प्रियतम मेरे प्राणनाथ चल साथ में तुझे मनाऊं मैं।

!!! मधुसूदन !!!

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23 thoughts on “Bebasi

    1. अभय जी हमने उसी दिन सोंच लिया था आपके कविता को पढ़कर—-परंतु-समयाभाव में नहीं लिख सका—–आपको पसंद आया– लिखना सार्थक हुआ साथ ही अच्छा लगा।

      Liked by 1 person

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