Samjhauta

Samjhauta

जख्म गहरे मगर मुश्कुराते रहे,
हंस के हर दर्द दिल में दबाते रहे,
भूल की थी किसी पर यकीन कर लिया,
अब कदम यूँ सम्हलकर बढ़ाते रहे,
जख्म गहरे मगर मुश्कुराते रहे।

आज भी याद में उसका चेहरा बसा,
लब थिरकते मगर कैसा पहरा लगा,
हम हंसे पर निगाहें उसे ढूढती,
स्याह रातों में उसकी छबि ढूढती,
कितनी प्यारी सजा ओ रुलाते रहे,
अश्क रातों को बिस्तर भिंगाते रहे,
भूल की प्यार में एक सजा पा लिया,
उस सजा का मजा हम उठाते रहे,
जख्म गहरे मगर मुश्कुराते रहे।

जिंदगी का सफर ना बना हमसफ़र,
यूँ तड़पते जिगर को मनाते रहे,
एक इंसान फिर से कोई ख़ास था,
मेरे दिल में बना जैसे मेहमान था,
हम भी इंसान खुद को बचा ना सके,
गम के सागर में उसको डूबा ना सके,
खुद को रोका ना उसको हटाते रहे,
जख्म गहरे मगर मुश्कुराते रहे।

कुछ पल की मिलन कितना समझा हमें,
मुश्कुराने पे गम का वजह पूछ दिया,
शांत सागर में जैसे तूफान आ गया,
अश्क बनके निगाहों में छा सा गया,
लब हिले भी नहीं, साथ में रो पड़ा,
दर्द का जैसे मेरा दवा बन गया,
आंसुओ की झड़ी क्या कहें थी घडी,
मानो सागर में सरिता समाने लगी,
ख्वाब बिखरे थे फिर से निखार आ गयी,
सूखे सावन में फिर से बहार आ गयी,
भूल फिर से किया साथ उसने दिया,
जख्म गहरे मगर हम, भुलाते रहे,
हंस के हर दर्द दिल से मिटाते रहे।

!!! मधुसूदन !!!

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23 thoughts on “Samjhauta

  1. मेरे अंतिम संस्करण से काफी समानताएं दिख रही है, पर यह उससे भी ज्यादा अच्छा ☺️

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    1. अभय जी आपके कविता को पढ़कर ही अनायास मन में बिचार आये , परंतु उस बिचार में और आपकी कविता में असमानता होते हुए भी एक समानता थी …..दर्द……मिलन की ……आपने हाल पूछा गम का ……..फिर ख़ुशी दिलाने का प्रयास किया…….और उसी कड़ी को आगे बढ़ा उन्हें मिलाने का अथक प्रयास किया—–पसंद आया —–आभार—-वैसे इस कविता का प्रेरणास्रोत आपकी कविता ही है ,पहले से कोई बिचार नहीं था—-धन्यवाद।

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    2. वैसे आपने पूछा था कनेक्शन ……जिसे मिलाने का भरसक प्रयास किया……अगर कोई कमी या संसोधन चाहते हों तो जरूर बताएं……..।

      Liked by 1 person

  2. जख्म गहरे मगर हम, भुलाते रहे,
    हंस के हर दर्द दिल से मिटाते रहे।

    मधुसूदन जी ,लाजबाब श्रेष्ठ रचना के लिए आपको बधाई 💐💐💐💐💐

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    1. ये तो आपका बड़प्पन है कि मेरी कविता का आप गुणगान कर रहे हैं।आपको बहुतबहुत आभार आपका।

      Liked by 1 person

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