Desh-Drohi

Desh-Drohi

कुछ थे कल मतलबी आज भी हैं वही,
स्वार्थ की कब्र पर मिट रही है जमीं,
कितने ईर्ष्या में वे घिर मिटे है मगर,
कल भी बदले नहीं आज भी हैं वही।

लोग आते रहे लूट जाते रहे,
कितने जीवन को पल में मिटाते रहे,
फिर भी एक दूसरे को झुकाने में वे,
दाग दामन में माँ का लगाते रहे,
कुछ सनकी थे अपनी लहू दें गये,
माँ की खुशियों के बदले जमीं सो गये,
जख्म हंस के सहे उफ़ तक ना किये,
याद करते उन्हें एक दिन के लिये,
राह उनकी थी कल आज भी है वही,
कल भी बदले नहीं आज भी हैं वही।

देख दुनिया कहाँ से कहाँ जा रहा,
धर्म जाति में तू आज भी है फसा,
जो बचाता तुम्हें क्यों तू दुश्मन बना,
इस धरा का नमक याद कर लो जरा,
ये जो सेना हैं मेरे जिगर जान हैं,
हैं भगत सिंह यही ये ही आज़ाद हैं,
धैर्य की तुम परीक्षा बहुत ले लिए,
क्या कहें हम तुम्हें कितना तुम गिर गए,
क्यों बिबस कर रहा चुप न बैठेंगे हम,
जुल्म तुम कर लिया अब सहेंगे न हम,
अब तिरंगे की आंधी में बह जाएगा,
तेरे जितने है झंडे उखड जाएगा,
हम समझ गए तेरी चाल था है वही,
कल थे तुम मतलबी आज भी है वही,
कल भी बदले नहीं आज भी है वही।
!!!मधुसूदन !!!

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21 thoughts on “Desh-Drohi

  1. इस तरह लिखने से ही इंकलाब आता है। और देश को इंकलाब की जरूरत है जो अभी सोया हुआ है, एसी के गलियारे में।

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    1. आपको मेरी कविता पसंद आ रही है हमें कितनी ख़ुशी है कह नहीं सकते—-कोटि कोटि आभार आपका।

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    1. आपने पसंद किया आभार आपका—अपने देश का यही हाल है सब तरफ अपने अपने धर्म और जाति के झंडे है समझ नहीं आता की हम अपने देश में है या किसी झंडे तले।

      Liked by 1 person

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