Majdoor Jag ki Shaan

Majdoor Jag ki Shaan

सूटबूट है किसी के तन पर,कोई पहना फटी लिबास,
सारे जग में दो जन देखे,सूट बूट और फटी लिबास।
मिहनत करता है जग सारा,सुटबूट और फटी लिबास,
बाबू और मजदूर में बंट गये,सूटबूट और फटी लिबास,

एक गरजता एक है सहता,
सहता ओ मजदुर बना,
उसी के खून पसीने के बल,
सुन्दर ये संसार बना,
किसी के हाथों नोट की गड्डी,
किसी को मज़दूरी की आस,
सारे जग में दो जन देखे, सूट बूट और फटी लिबास।

मज़दूरी को शान समझता,
पत्थर को पानी सा करता,
पर्वत को ओ तोड़ गिराता,
जहां सोच ना राह बनाता,
फिर भी किस्मत में मज़दूरों,
को मिल जाती है फटकार,
सारे जग में दो जन देखे सूट बूट और फ़टी लिबास।

दिन रात मिहनत करवाते,
फिर भी दो रोटी ही पाते,
शोषण की चक्की में पिसते,
हम सारे मजदुर कहाते,
खेती खाली छोड़ कृषक,
भरपूर फसल को पाते है,
मगर देख मज़दूर बेचारे,
शहर में पीसे जाते है,
संडे, नाईट, रोज लगाते, कैसे बदलेंगे हालात,
सारे जग में दो जन देखे,सूटबूट और फ़टी लिबास।

पूंजीपति है देश की शान,
मज़दूरों का काम महान,
तुक्ष नहीं है जग में कोई,
दोनों जग में एक सामान,
बिना श्रम संसार ना होगा,
पूंजी बिन बाज़ार ना होगा,
आओ अहम् को आज मिटाये,
मजदुर दिवस की शान बढ़ाएं,
प्यार जताओ मजदूरों से,बदल दो उनके अब हालात,
सारे जग में दो जन कर दो सूट बूट और सजी लिबास।

!!! मधुसूदन !!!







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