Safar Jindagi ka

Safar Jindagi ka

मुशाफिर मैं समंदर का,समंदर मेरी जान है,
लहरों से टकराकर ही बनी,मेरी ये पहचान है,
लड़ना ही जन्दगी है,नहीं डरता मिट जाने से,
पर बिबस,ठिठकता हूँ बीच समंदर जाने से |

 
ओ दूर चिढ़ाता तूफ़ान बेबस खड़ा मैं देखता,
क्या कहें कैसी मज़बूरी,क्या मेरी लाचारी है,
छोटी छेदवाली नौका मेरी जर्जर -पुरानी है|

 
काश मेरी नौका में छोटे-छोटे छेद ना होते,
सागर क्या फिर मैं तूफ़ान से टकरा जाता,
हिम्मत है क्या उस तूफ़ान को दिखा जाता,
जानता हूँ छोटा भी छेद जहाज डूबा देती है,
परन्तु डर भी इंसान को कायर बना देती है|

 
बस वापस लौट लौटकर मैं भी थक चुका हूँ,
बहुत हुआ बिबसता को पीछे छोड़ चुका हूँ,
एकलब्य बिना द्रोण ही जज्बा दिखाया था,
अभिमन्यु बिना रथ सूरमाओं को नचाया था,
चालीस मराठी भी इसी नौके के सामान ही थे,
जिसने चार हजार मुगलों के छक्के छुड़ाया था|

 

ऐ लहरों मत इठला हाथ में अभी भी पतवार है,
माना नौका में छेद मगर, मुझमें वही धार है,
गांव,शहर,देश,संसार,मुझमे छेद कहाँ नहीं,
मैं छेद भरता,जद्दोजहद करता आगे बढ़ता हूँ,
ऐसे छिद्रों से मैं बचपन से ही सदैव लड़ता हूँ,
भटक गया था मैं परंतु, अब होश में आया हूँ,
आ दिखा अपनी हिम्मत तुमसे टकराने आया हूँ,
माना नौका में छेद मगर, मुझमें अभी जान है,
तुमसे टकराकर ही बनी मेरी ये पहचान है|

!!! मधुसूदन !!!

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20 thoughts on “Safar Jindagi ka

  1. वाह सर – पंखो से नहीं होसलों से उड़ान होती है ! जिनके जीवन में मुसीबत नहीं है इसका मतलब वे जीवित नहीं है !

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  2. This line reminds us to stand back after the fall or despite the hole and again fight back..”माना नौका में छेद मगर, मुझमें वही धार है,”
    The juxtaposition of observations drawn from the philosophy of line is so well described ! On one hand as your post perfectly describes the numerous obstacles in this uncertain journey of life and on the other hand it also inspires us never to lose faith on ourselves!

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    1. सच कहा आपने —हम हमेशा सही सोचने का प्रयास करते हैं ।जब जो जी में आया लिख देते है परंतु समाज से परे नहीं।आपका बहुत बहुत आभार आपके राय एवं सराहना के लिए।

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