Kora Kaagaj

Kora Kaagaj

जीवन कोरा बिन अपनों के,
जैसे कोरा कागज,
धरती की ना प्यास बुझाये,
बिन पानी के बादल,
ख्वाब है बिन पानी के बादल,
आँख खुले तड़पाते,
क्या लिखूं मैं याद में तेरी,शब्द मुझे तरसाते।1

लिखना चाहूं,लिख ना पाऊं,
जज्बातों को मैं उकसाउं,
पढ़कर तुमको तेरा होकर,
ख्याल हजारों आतें,
क्या लिखूं मैं याद में तेरी,शब्द मुझे तरसाते।2

जल्दी से मैं शब्द सहेजूँ,
अपने कोरे कागज़ पर,
खुशियां,गम,जज्बात उधेलूं,
अपने कोरे कागज पर,
वरना पल में वो खो जाते,
हमको बहुत रुलाते,
क्या लिखूं मैं याद में तेरी,शब्द मुझे तरसाते।3

ख्वाब भी साथ निभाता है,
जब नींद से हम जग जाते हैं,
मगर शब्द हैं तेरे जैसे,
पल में ये खो जाते हैैं,
प्रेम बिरह की भाषा,
ना तू, शब्द समझ ही पाते,
क्या लिखूं मैं याद में तेरी,शब्द मुझे तरसाते।4

कलम हाथ में मेज पर कागज,
दुरी कितनी तुम जानो,
शब्दरहित मन खोया मेरा,
गम कितना है तू जानो,
अंतर तो बस इतना ही है,
तुममें और इन शब्दों में,
शब्द तो आते जाते हैं पर,
क्या तुम आये तुम जानो,
मौसम भी हर साल बदलते,
खुद को बदल ना पाये,
क्या लिखूं मैं याद में तेरी,शब्द मुझे तरसातेे।
क्या लिखूं मैं याद में तेरी,शब्द मुझे तरसातेे।5

!!! मधुसूदन !!!

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30 thoughts on “Kora Kaagaj

    1. इतनी सुन्दर तारीफ़ के काबिल मैं नहीं —आपने मुझे काबिलेतारीफ बना दिया–बहुत बहुत धन्यवाद आपका आपने पसंद किया।

      Liked by 1 person

    1. सहेज लीजिये—–दर्द भी सबको नसीब नहीं होता—-कितने ऐसे हैं संसार में जिसका कोई करीब नहीं होता,—-और जब कोई अपना नहीं तो दर्द कैसा—और दर्द है तो पराया कैसा—-बहुत बहुत धन्यवाद आपका।

      Liked by 4 people

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