Nothing Without Nation

Nothing Without Nation

हम कोमल-नाजुक पत्ते हैं,
खूबसूरती हमसे डाल की,
गर टूट गए डाली से हम,
है कीमत क्या फिर जान की।1

हम नाजुक हैं कमजोर नहीं,
टकरा जाते तूफानों से,
बेसक टकराकर अपना तन,
रक्त-रंजित भी हैं हो जाते।2

आती है घोर बिपत्ति जब-जब,
हम पर, बृक्ष या डाली पर,
हम एक दूजे के साथ खड़े,
हर चोट को सहते छाती पर।3

जब धुप जलाता है हमको,
उसका आहार बनाते हम,
बरसाता सूरज आग कभी,
उससे डटकर टकराते हम,
कुछ टूटते है कुछ सुख जाते,
कुछ डाल से दूर नहीं जाते,
टकरा कर धुप, तुफानो से,
बेशक लतपथ हम हो जाते।4

जिस डाल के हमसब पत्ते हैं,
उस बृक्ष की जड़ कमजोर नहीं,
तूफ़ान भी अब शर्मिंदा है,
उसमे भी इतना जोर नहीं,
हैं गिरे बृक्ष वे नाजुक थे,
जड़ में उसकी थी जान नहीं,
पत्ते,डाली जिस बृक्ष के हम,
उसका हिलना आसान नहीं।5

ये बृक्ष हमारा ही भारत,
हम पत्ते उसकी जान हैं,
है धर्म,जाति सब डाल के जैसे,
गर्व यही अभिमान है,
हम हरे हैं तो मुश्कान देश का,
बसती हम में जान हैं,
डाली से डाली टकराये फिर,
दुश्मन की क्या काम है।6

है बृक्ष से डाली का जीवन,
डाली पत्तों की जान सी,
गर टूट गए डाली से हम,
है कीमत क्या फिर जान की।
गर टूट गए डाली से हम,
है कीमत क्या फिर जान की।7
!!! मधुसूदन !!!

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