Sonch

Sonch

मुल्क वही इंसान वही,एक शोषित एक शासनकर्ता,
बीत गयी सदियां कितनी,ना हम बदले ना तुम बदला।

जंग लड़े हमने भी कितने,भूख कभी बिमारी से,
देख रहे थे मरते बच्चे,बेबस और लाचारी से,
बच्चों के हालात बदलने,सोच लिया रण में जाना,
भूख से मरने से बेहतर है,गोली खाकर मर जाना,
कब सुधरेगी दशा हमारी,आशा जिससे करते हैं,
क्रूर का निकला बाप,भरोसा वही तोड़ते रहते हैं,
शासनतंत्र बदलकर देखा,मगर गरीबी ना बदला,
बीत गयी सदियां कितनी,ना हम बदले ना तुम बदला।

आज भी झोपड़ पट्टी है जो पांच साल में दिखती है,
भूख,गरीबी और बिमारी मदद को आज तरसती है,
चकाचौंध है कल के जैसा,संसद के गलियारों में,
धनानद,दुर्योधन जैसे ही दिखते मैदानों में,
कर्ण और एकलब्य की हालत आज भी कल के जैसा है,
शंखध्वनि,घंटे,अजान के बीच  मानवता नंगा है,
न्याय की आँखों बंधी पट्टी,अनपढ़ बनते अधिकारी,
नीतिहीन के हाथ में शासन,पढ़े लिखे हैं चपरासी,
अपनी हालत बद से बदतर,जाति धर्म का भूत चढ़ा,
बीत गयी सदियां कितनी,ना हम बदले ना तुम बदला।

बार बार के जंग से हम भी,हार गए इस दुनिया में,
अपनों की कुर्बानी देकर,हार गए इस दुनिया में,
काश गरीबी क्या होती है,मेरे घर तुम आ जाते,
रोटी की एक टुकड़े की हम,कीमत तुमको समझाते,
स्तन माँ का सुख गया है,भूख को क्या तुम जानोगे,
मरते रोज बिमारी से हम,दर्द को क्या पहचानोगे,
जाति,धर्म ना शोषित का है,ना ही शोषणकर्ता का,
लोकतंत्र में यही अस्त्र,बन बैठा शासनकर्ता का,
कल भी योग्य,गरीब बँटे थे,आज भी सोंच नहीं बदला,
बीत गयी सदियां कितनी,ना हम बदले ना तुम बदला।

!!! मधुसूदन !!!

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35 thoughts on “Sonch

    1. अच्छा लगता है जब कोई दर्द को समझता है—वैसे हम दर्द सो कोई अछूते नहीं हैं,बहुत बहुत धन्यवाद आपका।

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  1. सरकारें शायद आपकी लेखनी पढें, तो उनकी भी जमीर हिल जाये, शर्त है उनमें जमीर बची हो

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    1. बिलकुल सही कहा आपने—-वैसे जमीर इनमें होती तो हमसब को लिखने की जरुरत ही नहीं पड़ती,हम उनको मृत ही समझते हैं,लिखते तो सिर्फ खुद को जगाये रखने के लिए।सुक्रिया अभय जी आपने पसंद किया।

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  2. क्या भाव प्रकट किया है आपने इस कविता के माध्यम से, बहुत खूब लिखा है। महुसुधन सर अपने।
    धन्यवाद आपका।

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    1. सुक्रिया आपका,ख़ुशी होती है आपसबों की हौसलाभरी शब्दों से।बहुत बहुत धन्यवाद आपका।

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  3. बहुत ही सुन्दर कृति मधुसूदन सर! क्या भाव प्रकट किया है आपने इस कविता के माध्यम से, बहुत भरे है।
    न जाने कब मीटेगी ये ग़रीबी। जो कल था आज भी वही है,
    न जाने कब आएंगे अच्छे दिन। जो कल था आज भी वही ह।
    बहुत ही सुन्दर लेखनि! ध्यन्यवाद आपका इतनी सुन्दर रचना के लिए।

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    1. मैं जितनी भी आपका आभार ब्यक्त करूँ कम होगी ,आपको कविता अच्छी लगी तो जरूर अच्छी होगी।सुक्रिया विकाश जी।

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  4. Bahut hi samvedansheel kavita, aaj bhi desh aur duniya me garibi hai jise aapne khubsurat shabdon se sajaaya h. Par sir ye amiri garibi humesha rahegi par chehre awashya badalte h, varg awashya badalta h…. Isiliye alag sonch rakhta hu aapse aur sabse ummid karunga ki wo khud ki takdeer badle aur garibi k jaal ko kaate

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    1. आप हमसे बिलकुल अलग नहीं हैं शायद हम समझा नहीं पाये।चाहे कोई भी जाती धर्म हो ना गरीब बदला ना ही अमीर। मैं तो संसार में अकेला आया फिर हमें जाति और धर्म में बाँधा गया।परंतु गरीब , मजबूर और भूखे , बीमार की कोई जात नहीं होती।सबकी तड़प एक सी होती है।जो आज भी है और शासनकर्ता पहले से ज्यादा क्रूर हो गया है।सुक्रिया पढ़ने और इतना अच्छा तर्क देने के लिए।

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    2. आप गरीबी से निकलने में मदद नहीं देते कोई बात नहीं हम पार निकाल जाते परंतुजो रक्षक हैं वही मेरे लिए जाल बुनते हैं बस बिडम्बना इसी बात का है। सुक्रिया।

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  5. शासक कभी भी सत्ता हाथ से जाने नहीं देगा, भले हम आज कॉलोनी में रहने लगे हो, एक से बढ़कर एक philosophy रचते हो, धर्म न्याय और सबको समान बुझते हो पर ध्यान से समझे तो जंगल वाला नियम आज भी लागू है, और कुछ लोग तो कमोबेश चाहते भी है कि फिर से मानव आदिम मानव के समय में पहुँच जाए जहाँ न समाजवाद था न पूंजीवाद…
    वैसे मैं धर्म में बुराई नहीं मानता लोगों में भी नहीं बस हमसबकी कमजोरी है जिसपे काम करने चाहिए, गरीब अगर अमीर न बनते होते तो चन्द्रगुप्त मौर्य, अम्बानी, लालू, मायावती जैसे लोगों को आज कोई न जानता, सबने अपने बूते अपनी पहचान बनाई…. पर मांगने से उतना ही मिलेगा हमसबको जितना और लोग छोड़ेंगे

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