Chand

Chand

मजहब है ना चाँद का कोई,
हम सब की मजहब में चाँद,
जिसकी जैसी आँखें वैसी,
आँखों में दीखता है चाँद।

कोई कहता चन्दा मामा,
कोई कहता दूज का चाँद,
करवाचौथ के व्रत को तोड़ा,
थाल में देखी जब वो चाँद,
राजा दक्ष के चाँद जमाई,
शीश शुशोभित शिव-शम्भू,
सारे जग को शीतल करता,
तू सारे जग के बंधू,
मगर हमारे मन-मस्तिष्क में,
तू है मामा मेरे चाँद,
जिसकी जैसी आँखें वैसी,
आँखों में दिखता तूँ चाँद।

एक माह रमजान का रोजा,
कठिन तपस्या व्रत भारी,
जब दिखता वो आसमान में,
घर-घर छाती खुशहाली,
सिर पर टोपी,वस्त्र नए,
हर घर में बनती है पकवान,
एक माह रमजान का रोजा,
तोड़ा देख के ईद का चाँद,
तू मेरे धड़कन से बढ़कर,
बिन तेरे सब धूल समान,
जिसकी जैसी आँखें वैसी,
आँखों में दिखता तूँ चाँद।

सबका प्यारा चन्दा फिर भी,
धरती पर तुम मत आना,
तेरे टुकड़े कर देंगे हम,
मजहब के हम दीवाना,
फिर ना होगा मामा जैसा,
करवाचौथ नहीं होगा,
खुशियों का रमजान महीना,
ईद मुबारक ना होगा,
मजहब माना नहीं है तेरी,
मगर हमारी मजहब जान,
हमसब से तुम दूर ही रहना,
मेरे प्यारे मेरे चाँद,
जिसकी जैसी आँखें वैसी,
आँखों में दिखता तूँ चाँद।

!!!मधुसुदन !!!

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27 thoughts on “Chand

  1. फिर ना होगा मामा जैसा,
    करवाचौथ नहीं होगा,
    खुशियों का रमजान महीना,
    ईद मुबारक ना होगा,
    मजहब माना नहीं है तेरी,
    मगर हमारी मजहब जान,

    वाह चाँद के जरिये आपका मज़हबी तंज़ शानदार है।

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