Phir Bebas Ek Kisan

Phir Bebas Ek Kisan

*पंद्रह दिन पहले की हृदयविदारक सच्ची घटना पर आधारित कविता।*

रात का गहरा अंधेरा,नर को एक तूफान घेरा,
एक ऐसी रात आयी,देख ना पाया सबेरा।2

तीन एकड़ काश्तकारी,
बाप ने दी जिम्मेवारी,
चाँद सी दुल्हन मिली थी,
चल रही थी बैलगाड़ी,
दिन गुजरता बैल संग में,
रात दामन चाँद संग में,
रूखी-सुखी मेवे जैसी,
जश्न जैसा चाँद संग में,
पूस की शीतल पवन हो,
जेठ की तपती लहर हो,
बैल संग खेतों में अबिचल,
चाहे बारिस की कहर हो,
जोश यौवन में भरा था,
आग जैसा वो बना था,
हारना उसने न जाना,
काल भी उससे डरा था,
वीर की छोटी जहाँ में,स्वर्ग का मानो बसेरा,
एक ऐसी रात आयी,देख ना पाया सबेरा।2

दिन जवानी के गुजर गए,
बोझ जीवन मे थे बढ़ गए,
साथ एक बिटिया सयानी,
सोच शादी के थे बढ़ गए,
रब की उसने की दुहाई,
बिनती शायद रास आई,
तीन बरसों बाद अबकी,
स-समय बरसात आई,
अबकी खेती खूब होगी,
हाथ बिटिया पीली होगी,
दुख मिटेंगे अब हमारे,
सुख की अब बरसात होगी,
बैल बूढ़ा बेच डाला,
घर से पैसे सब निकाला,
बैल जोड़े साथ लाने,
सोचकर बाजार भागा,
बैल की महंगी बड़ी थी,
हाथ पैसों की कमी थी,
मेले में सब ख्वाब उसकी,
धूल-धूसरित हो गई थी,
डगमगाए पैर उसके,आंख पर छाया अंधेरा,
एक ऐसी रात आयी,देख ना पाया सबेरा।2

खुद को फिर उसने सम्हाला,
मन मे फिर एक आस जागा,
अब किसानी लोन लेंगे,
दूर होगी सारी बाधा,
बिन रुके फिर बैंक भागा,
लोन अर्जी उसने डाला,
पर मिली ना लोन उसको,
चढ के सीढियां उसने हारा,
हाय रब हाय जमाना,
तू कृषक ना दर्द जाना,
एक छोटी सी खुशी भी,
देख ना पाया जमाना,
लौ हुआ मद्धिम बना चट्टान को तूफान घेरा,
एक ऐसी रात आयी,देख ना पाया सबेरा।2

देख चिंतित,मन मे किंचित,
भय बढ़ी उस चाँद को,
जिसने जीवन भर ना देखा,
इतनी दुखिया जान को,
जानकर सारी बिबसता,
धैर्य देती जान को,
नथिया,झुलनी जो भी था,
सब दौड़ देती प्राण को,
देखकर भयभीत बोली,
कुछ ना सोचो जान तुम,
गर तुझे कुछ हो गया तो,
ना बचेगी जान सुन,
सुन जुताई भाड़े की,
ट्रेक्टर से हम करवाएंगे,
फसल होगी अच्छी शादी,
बिटिया की करवाएंगे,
पर कृषक था मौन,जैसे एक लहर को बांध घेरा,
एक ऐसी रात आयी,देख ना पाया सबेरा।2

टार्टराहत मेढकों की,
झींगुरों की शोर में,
रो रहा था एक कृषक फिर,
बादलों की शोर में,
दिन में खेला था उसने,
अपनी बिटिया साथ में,
माथे को चूमा था उसने,
अपनी बिटिया जान के,
चाँद ने समझा हमारी,
बात उसने मान ली,
आज पहली बार मन,
ना समझी अपने जान की,
कस के फंदा वो लगाया,
आंख झरझर बह रहे,
झूल गया फंदे से तन में,
प्राण उसके ना रहे,
फिर झुका इंसान,महंगी का चला उसपर हथौड़ा।
मौत बन एक रात आयी,देख ना पाया सबेरा ।2।

                                    Cont part…2

महंगी ने ली ली फिर से जान एक किसान की,
सचमुच में मुश्किल में है जान अब किसान की,
महंगी ने ली ली फिर से जान एक किसान की।

                                         

!!! मधुसूदन !!!

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40 thoughts on “Phir Bebas Ek Kisan

    1. Aap jaise log jab taarif karte hain to kabhi kabhi aisa sochawat aane lagta hai ki shayad main bhi khuchh achchha likhne lagaa hu…….sukriya Abhay bhai hausla badhaane ke liye.

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