Mahangayee Maar Gayi

Mahangayee Maar Gayi

पंद्रह दिन पहले की हृदयविदारक सच्ची घटना पर आधारित कविता।

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महंगी ने ली ली फिर से जान एक किसान की,
सचमुच में मुश्किल में है जान अब किसान की,
महंगी ने ली ली फिर से जान एक किसान की।

हीरे,मोती,सोने,चांदी,
चमड़े के ब्यापार में,
माल खजाना भरे हुए हैं,
इनके ही भंडार में,
बढ़ते हैं तन्ख्वाह यहां पर,
देखो अफसरशाहों के,
किसे पता है मातम मनती,
घर मे रोज किसानों के,
आजा मिलकर के दे हम साथ,अब किसान की,
सचमुच में मुश्किल में है जान अब किसान की।

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भरता जग का पेट वही अब,
भूखे ही सो जाता है,
रबड़ी खाते कुत्ते,भूख से
कृषक यहां मर जाता है,
बदन गलाता कृषक धूप में,
गर्मी और बरसात में,
फिर भी पैसे कफ़न के ना,
रहते मरने के बाद में,
हो जाता खेत फिर नीलाम,उस किसान की,
महंगी ने ली ली फिर से जान,एक किसान की।

झूल रहा है बदन डोर से,
तन में है अब जान कहां,
बगल के कमरे में माँ,बिटिया,
आफत से अनजान वहां,
माली गुलशन छोड़ के भागा,
अनजाना फुलवारी है,
सोच के देखो उनपर कैसी,
बिजली गिरनेवाली है,
मेघा संग बरसेगी अब चाँद,उस किसान की,
महंगी ने ली ली फिर से जान एक किसान की,
सचमुच में मुश्किल में है जान अब किसान की।

Cont…..

!!! मधुसूदन !!!

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11 thoughts on “Mahangayee Maar Gayi

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