Insan aur Singhashan(Part.1)

Insan aur Singhashan(Part.1)

मैं एक अदना सा इंसान,
जग में मेरी क्या पहचान,
मेरी सदियों से एक उलझन,
रोटी,कपड़ा और मकान,मैं एक अदना सा इंसान।

राजतन्त्र या लोकतंत्र हो,
या हो खेल सिंघासन का,
जाति,धर्म या देश की सीमा,
या हो खेल बिभाजन का,
बातें सब ये बहुत बडी है,
सदियों से इससे अनजान,मैं एक अदना सा इंसान।

सिंघासन को जंग हुई है,
सदियों से इस धरती पर,
सैनिक मरते शासक बनते,
सदियों से इस धरती पर,
हम तो केवल करदाता हैं,
मेरी और नहीं पहचान,मैं एक अदना सा इंसान।

जैसा शासक कर भी वैसा,
कैसे कह दूं कौन है कैसा,
शासक क्रूर तो करता शोषण,
रहा दयालु करता पोषण,
इनमें अटकी मेरी जान,मैं एक अदना सा इंसान,
मेरी हालत एक समान,मैं एक अदना सा इंसान।

Click here to read part 2

!!! मधुसूदन !!!

Advertisements

24 thoughts on “Insan aur Singhashan(Part.1)

      1. आपके सुंदर रचनाओ पर अपना विचार व्यक्त करना हमारे लिए खुशी की बात है।

        Liked by 1 person

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s