Urmila ki Dasha

Urmila ki Dasha

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सजी ऐसी अवध नगरी,की दुल्हन भी नहीं सजती,
लखन, सिया,राम आये हैं,ख़ुशी कहते नहीं बनती।
महल का एक कोना है,
जहाँ पत्थर की एक मूरत,
बिरह की आग में जलती,
किसी की राह है तकती
हैं आँखे उसकी पत्थर सी,
जुबाँ खामोश हैं जिसकी,
है स्वागत गान में शामिल,उर्मिला नाम है उसकी,
लखन,सिया,राम आये हैं,ख़ुशी कहते नहीं बनती।

बिनय लक्ष्मण ने की,
उर्मि उसे आज्ञा बना डाली,
दफ़न कर दर्द माँ कौशल्या की,
वो बन गयी साथी,
बहादुर थे समर जीता,
मगर अपराध को समझे,
बिरह की आग चौदह वर्ष की,
वनवास को समझे,
महल में थे खड़े लक्ष्मण, मगर नजरे नहीं उठती,
लखन,सिया,राम आये हैं,ख़ुशी कहते नहीं बनती।

सजी थी सेज बरसों की,
जो सूनापन लिए बैठी,
बिरह की स्याह रातों की,
सिसकती सेज है हरषि,
मगर फैली है सन्नाटा,
लखन गमगीन हैं ऐसे,
हराये वीर कितने पर,
खड़े निर्जीव के जैसे,
फनकता फ़न धरा जिसपर,
कभी ना हार मानी थी,
उसी शेषावतारी की,
दशा उर्मि ने पहचानी,
ब्रती उर्मि की अखियन से,छलकती प्रेम की मोती,
लखन,सिया,राम आये हैं,ख़ुशी कहते नहीं बनती।

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पुरुष का नाम होता है,
तपस्यालीन है नारी,
फनकता मर्द सदियों से,
मगर गंभीर है नारी,
कोई बिनती कोई आदेश,
सब माने वो हंसकर के,
पुरुष की हर ख़ुशी-गम में,
खड़ी सदियों से है नारी,
पुरुष जलता है दीपक सा,
दिए की तेल है नारी,
तपस्या,त्याग,ममता,स्नेह की,
जलधाम है नारी,
डरा यमराज सदियों से,
पतिब्रत धर्म से उसके,
पति की छीन लाती प्राण भी,
यमराज से नारी,
जहां भगवान् नतमस्तक,है जिससे काल भी डरती,
उसी नारी की पीड़ा आज तक,सदियों से ना बदली,
ख़ुशी का आज है मौक़ा,
सजी दुल्हन अवध नगरी,
लखन,सिया,राम आये हैं,ख़ुशी कहते नहीं बनती।

!!! मधुसूदन !!!

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36 thoughts on “Urmila ki Dasha

  1. ” पुरुष का नाम होता है,
    तपस्यालीन है नारी,
    फनकता मर्द सदियों से,
    मगर गंभीर है नारी ”
    बडा खुबसुरत वर्णन किया है आपने !!

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