Garh Pithora/गढ़ पिथौरा

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आर्य-द्रविड़ की धरती भारत,
सोने की चिड़ियाँ थी भारत,
पड़ी विश्व की नजर कथा उस जम्बूद्वीप की गाता हूँ,
क्रूर मुहम्मद गोरी और चौहान का शौर्य सुनाता हूँ||

कैद हुए जब पृथ्वीराज तब रण में मातम छाया,
काल के जैसे सैनिक का भी सुनकर दिल घबराया,
बिन राजा के हाल वहाँ सैनिक का कैसा होगा,
बिन माता के बच्चा जस सुनसान में रोता होगा,
क्रूर,लुटेरे,धर्मांधों ने नंगा नाच किया था,
वीर हिन्द के सैनिक का उसने उपहास किया था,
कुछ डर से इस्लाम बने तब,कुछ थे शीश कटाये,
कुछ को खौफ नहीं मरने की उसको दास बनाये,
दासों की क्या दसा लोभ को जिसने छोड़ दिया था,
उनकी देख दसा पशुओं का भी तब नीर बहा था,
धर्मांधों का राज हुआ था,माँ का आँचल लाल हुआ था,
धन्य लाल थे वीर कथा उन वीरों का दुहराता हूँ,
क्रूर मुहम्मद गोरी और चौहान का शौर्य सुनाता हूँ।।

लेकर ऐबक ने दासों को दुर्ग पर किया चढ़ाई,
दुर्ग के चारों ओर पड़े गड्ढ़ों ने होश उड़ाई,
दीवारों में कील लगे थे दरवाजों पर कील,
गड्ढ़े दरवाजे तक जिसमें भरा हुआ था नीर,
दिल दहलाने वाली तब ऐबक ने कृत्य किया था,
मिटटी के बदले दासों से गड्ढ़े पाट दिया था,
धन्य लाल वे वीर,बहादुर फिर भी नहीं डिगे थे,
मातृभूमि और स्वाभिमान के खातिर प्राण दिए थे,
दुष्ट दुर्ग में घुस गए थे,कुत्सित लाखों ख्वाब सजे थे,
मगर एक ना नार मिली उस दुर्ग की गाथा गाता हूँ,
रौंद दिया सभ्यता उसी भारत की हाल सुनाता हूँ ||
!!! मधुसूदन !!!

Cont….part ….6

“ये देश हमसभी जाति,धर्मावलंबियों का है,किसी एक की भी उपेक्षा कर इस देश की कल्पना नहीं की जा सकती और उपेक्षा कोई करे भी क्यों, पूर्व में हमसभी तो आर्य-द्रविड़ ही थे।ये भी देखने में नाम दो है परंतु दोनों एक ही हैं,बस उत्तर में रहनेवाले आर्य और दक्षिणवाले को कालान्तर में द्रविड़ कहा जाने लगा,ततपश्चात हम कई धर्म एवं जातियों में विभक्त हो गए। मेरे तरफ से वहीं से एक कविता लिखने का एक छोटा प्रयास,शायद आप सब को पसंद आये।”

Arya-dravid kee dharatee bhaarat,
Sone kee chidiyaan thee bhaarat,
padee vishv kee najar katha us jamboodveep kee gaata hoon,
kroor muhammad goree aur chauhaan ka shaury sunaata hoon.

kaid hue the prthveeraaj tab ran mein maatam chhaaya,
kaal ke jaise sainik ka bhee sunakar dil ghabaraaya,
bin raaja ke haal vahaan sainik ka kaisa hoga,
maat bina jaise bachcha sunasaan mein rota hoga,
kroor,lutere,dharmaandhon ne nanga naach kiya tha,
hind ke veer,bahaadur sainik ka upahaas kiya tha,
kuchh dar se islaam bane tab,kuchh the sheesh kataaye,
kuchh ko khauph nahin marane kee usako daas banaaye,
daason kee kya dasa lobh ko jisane chhod diya tha,
unakee dekh dasa pashuon ka bhee tab neer baha tha,
khoon se dharatee laal hua tha,dharmaandhon ka raaj hua tha,
dhany laal the veer katha un veeron ka duharaata hoon,
kroor muhammad goree aur chauhaan ka shaury sunaata hoon.

lekar aibak ne daason ko durg par kiya chadhaee,
durg ke chaaron or pade gadhon ne hosh udaee,
deevaaron mein keel lage the daravaajon par keel,
gaddhe darwaaje tak jisme bhara hua tha neer,
dil dahalaane vaalee tab aibak ne kritya kiya tha
mittee ke badale daason se gaddhe paat diya tha,
dhany laal ve veer,bahaadur phir bhee nahin dige the,
maatrbhoomi aur svaabhimaan mein hansakar praan die the,
phaatak tod durg mein aaya,man mein laakhon khvaab sajaaya,
magar ek na naar milee us durg kee gaatha gaata hoon,
raund diya sabhyata usee bhaarat kee haal sunaata hoon.
!!! madhusudan !!!

Cont….part ….6

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33 thoughts on “Garh Pithora/गढ़ पिथौरा

  1. सही लिखा …लेकिन अफ़सोस हम लोग जाति धर्म से ही ऊपर ना आ पाते है तो देश की प्रगति कैसे बढ़ेगी …. बहुत बढ़िया

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    1. सही कहा जाती धर्म सब सही है लोग जोड़तोड़ की राजनीति करते हैं और हम मोहरा बन जाते हैं क्षणिक स्वार्थ में।जबतक हम अपने स्वार्थ और मानसिकता को बदल देश और इंसान को सर्वपरि नही मान जाति और धर्म को श्रेष्ठ दिखलाने में उलझे रहेंगे तबतक हम मिटते रहेंगे।।सुक्रिया आपके।

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  2. शायद बिडम्बना ही है अपने देश की शदियों से आज तक हम जाति और धर्म मे ही उलझ इंसानियत का नँगा नाच कर रहे हैं। पता नही कब इंसान बनेंगे।सुक्रिया आपने पसन्द किया और सराहा।।

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  3. मैं मानता हूँ की यदि अपनी खुद की सोच और देखने का नजरिया बदल लिया जाये तो तो ये देश क्या पूरी दुनिया बदल सकती है ।

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    1. अगर हमारे देश के लोगों की मानसिकता बदल जाये तो ये देश अंधेरे में भी चमकने लगेगा और संसार भी सम्भव है अपनी मानसिकता बदल लें।रोड़ा तो सिर्फ जातिवाद और धर्मवाद है।

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  4. और रही बात जाती धर्म और मजहब की तो प्रक्टिकली सोचने वाली बात है की इन सब चीजों को बनाने वाला इनशान ही है। और ये सब लोगों को बेवकूफ बनाने तथा कमायी का जरिया है। इनशान लाख बूरा करता है फिर भी शाम को ईश्वर को पूजने पहुँच जाता है।

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    1. सही कहा आपने।अगर हम गलत करे और मंदिर रूपी घर मे बैठे भगवान रूपी माँ पिता से माफी मांगते हैं तो एक सुकून मिलता है ठीक वैसे ही किसी को मस्जिद,मंदिर या गिरिजाघर में सुकून मिलता है।कोई पत्थर में भगवान को देखता है कोई पेड़ और पहाड़ में कोई निराकार कोई आकार बना पूजता है।यहां तक कोई बुराई नही मगर जब कोई एक दूसरे के विश्वास पर ढकोसला बोल कुठाराघात करता है तब बुरा है।हर रंग अपने आप मे खूबसूरत है एक रंग ना करो।हर जाति उस रब की देन हैं मतभेद ना करो तो निश्चित ही धरती जन्नत बन जाये।

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      1. बिलकुल सही बात जीसपे दिल से श्र्द्धा करता है इनशान वही भगवान बन जाता है। जब कण कण में बसा है हमारा पावन ईश्वर तो मंदिर रूपी घर में जाने की क्या जरूरत है। और जिस भगवान ने हमें बनाया भला हम उसे क्या दे सकते है। हमारा भगवान जो हमें इस धरती पर नेक कर्म करने के वास्ते भेजा है। वह मातृ और पितृ के समान है और कोई माता पिता अपने बच्चों को दुखी नहीं देख सकता तो फिर हमारा क्या हक है की उस ईश्वर की संतान को हम दुखी करें फरेब करें और उसका दिल दुखाये। और यदि ऐसा करतें है तो फिर कितनी भी पूजा करें ख़ुदा खुश नहीं होगा ।

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      2. सराहनीय शब्द और विचार आपके।किसी का दिल दुखाने से सच में उपरवाला नही मिल सकता। वह कण-कण में है और छोटा से छोटा जीव में भी रब विद्यमान है जिसकी जानबूझ कर हत्या,बलि या कुर्बानी से रब दुखी होते हैं।रही बात यदि भगवान कण कण में है फिर मंदिर या मस्जिद में जाने की क्या जरूरत।ये हम समझते हैं मगर जिसे मस्जिद जाकर सुकून मिले किसी को मंदिर,गिरिजाघर या पेड़ या पहाड़ या अपने माँ बाप को ही पूजकर रब की अनुभूति हो इसमें हम आपत्ति करनेवाले या ढकोसला बोल किसी के दिल दुखानेवाले कौन होते हैं।अगर ऐसा हम करते हैं तो हम निश्चित पापी हैं फिर प्रतिकार तो सहना पड़ेगा। सुक्रिया आपने अपने अमूल्य और सुन्दर् विचार प्रकट किया।

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