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Antarkalah

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क्या क्या सहा ये वतन हँसते-हँसते, किसे ये दिखाये जखम हँसते-हँसते,।। जिसे इसने अपने जिगर में बसाया, माथे की बिंदिया जिसे था बनाया, कभी नाज़ करता था ये जिसके बल पर, उसी ने उजाड़े चमन हँसते-हँसते, किसे ये दिखाये जखम हँसते-हँसते।। चाहत बिना यहाँ कुछ भी नहीं है, मगर चाहतों से बुरी कुछ नहीं है, … Continue reading Antarkalah