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Desh-Drohi

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कुछ थे कल मतलबी आज भी हैं वही, स्वार्थ की कब्र पर मिट रही है जमीं, कितने ईर्ष्या में वे घिर मिटे है मगर, कल भी बदले नहीं आज भी हैं वही। लोग आते रहे लूट जाते रहे, कितने जीवन को पल में मिटाते रहे, फिर भी एक दूसरे को झुकाने में वे, दाग दामन … Continue reading Desh-Drohi