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RUH AUR INSAAN

RUH AUR INSAAN

मैं तो तेरे साथ प्रिय, रब जुदा जिस्म से कर डाला, कैसे रूह का रूप दिखाऊँ, तुझे बनाऊं मतवाला। हमपर लाखों पहरे कलतक, आज ना कोई है बंदिश, मगर जिस्म के बिना मैं पगली, तेरे प्रेम से है बंचित, गम की दरिया तेरी किश्ती, मैं थी तेरी एक आशा, चौखट तू गमगीन जश्न का, मुझ … Continue reading RUH AUR INSAAN

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